Thursday, March 12, 2009

कहानी II

पिछली बार जब तुम आए थे, लगा था की कुछ ख़ास हो। तुम्हे अपने पास देखकर हमेशा एक हसी सी होठों पर आ जाती थी। नज़रें हमेशा तुम्ही को ढूंढती और लगता की जो चेहरा ख्वाबों में आया करता था, अब वो सामने आ गया। मुझे लगा था की ज़रूर कुछ तो होगा हमारे बीच।

पर जब उस दिन तुम बिना कुछ कहे चले गए, इस सब को एक ख्वाब मानकर, तुम्हे हमेशा के लिए भुलाने की ठानकर और अपने बावले मन को कोस कर हम आगे चल पड़े।

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